अलविदा करूणानिधि : प्रेम कुमार मणि वाया दिलीप मंडल
| 08 Aug 2018

तमिल राजनीति के दिग्गज राजनेता करूणानिधि (जन्म 3 जून 1924 ) 7 अगस्त की शाम दिवंगत हो गए . वह 94 वर्ष के थे और स्वाभाविक था उम्र के कारण लम्बे अरसे से अस्वस्थ थे .

तमिलनाडु पहले मद्रास प्रान्त था और वहां सामाजिक आंदोलनों की एक परंपरा रही है ,जिसे उत्तर भारतीय लोगों को समझना मुश्किल होता है .

तमिल मिजाज को समझना हमारे लिए आज भी आसान नहीं है .मसलन ,हमारी बुद्धि को यह स्वीकारने में कठिनाई होती है कि तमिल संस्कृत से पुरानी भाषा है और उसका साहित्य भंडार कहीं समृद्ध है .

1930 के दशक में पेरियार रामासामी नायकर ने वहां द्रविड़ अस्मिता आंदोलन को खड़ा किया और उत्तरभारतीय आर्य संस्कृति को कड़ी टक्कर दी .

उपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रीय आंदोलन के कारण पेरियार का आंदोलन 1960 के बाद ही प्रभावपूर्ण बना ,जब उनके ही शिष्य मित्र अन्नादुरै ने उसे नयी गति दी . अन्नादुरै के अनुगामी मित्र करूणानिधि ने उस लकीर को और आगे बढ़ाया .
विसंगतियां भी उभरीं ,लेकिन मैं समझता हूँ उस पर चर्चा का आज समय नहीं है .
करूणानिधि कुल मिला कर दिलचस्प नेता थे . मूलतः वह लेखक थे और मेरी जानकारी के अनुसार फ़िल्मी पटकथा लेखक के रूप में उनकी ख्याति थी . वैचारिक रूप से वह समाजवादी थे . उनके एक बेटे ,जिन्होंने उनका राजनीतिक उत्तराधिकार हासिल किया है ,का नाम स्टालिन है ,जो उन्होंने रुसी कम्युनिस्ट नेता जोसेफ स्टालिन से प्रभावित होकर रखा था . इससे करूणानिधि की तत्कालीन सोच का पता मिलता है .

सामाजिक रूढ़िवादिता और अंधविश्वासों के विरोध और नास्तिकता केलिए वह कुछ -कुछ अपने दादागुरु पेरियार की तरह ही चर्चित रहे . स्थापित सामाजिक वर्चस्व का जिस तरह उन्होंने विरोध किया ,और जिस तरह समाज की धारा बदल दी वह अपने आप में एक उदाहरण है .

अब वह दिवंगत हैं . उम्मीद है देश के लोग उन्हें याद रखेंगे . उन्हें मेरी श्रद्धांजलि .