बचपन में ही पड़ते हैं घृणा के बीज : दिलीप मंडल
| 23 Jun 2018

मेरा यह लेख मेरे शिक्षक और दोस्त प्रोफेसर एडवर्ड रॉड्रिग्ज यानी ऐडी को समर्पित है, जिनसे मैंने सोशियोलॉजी के कुछ अध्याय सीखे हैं. ऐडी ने मुंबई सेंट जेवियर्स कॉलेज, मुंबई यूनिवर्सिटी और जेएनयू में पढ़ाया. ऐडी पिछले साल की सर्दियों में कैंसर का शिकार हो गए. वे बेहतरीन शिक्षक थे.

बचपन में ही पड़ते हैं घृणा के बीज

हम हिंसक, सांप्रदायिक या जातिवादी पैदा नहीं होते हैं, बनाए जाते हैं. इनकी ट्रेनिंग हमें अक्सर बचपन में परिवार, नानी की कहानियों, मोहल्लों और स्कूल तथा टेक्स्ट बुक से मिलती है.

दिलीप मंडल

कर्नाटक में एक आदमी से कहा जाता है कि धर्म की रक्षा करनी है और इसके लिए एक आदमी को मारना है. वह आदमी धर्म की रक्षा करने के लिए तैयार हो जाता है. बताई गई औरत को वह मार आता है, बगैर यह जाने कि उस औरत की वजह से उसका धर्म खतरे में कैसे आ गया.

एक गांव के मंदिर से एक दिन घोषणा होती है कि गांव के एक आदमी के घर की फ्रिज में एक पवित्र पशु का मांस है. गांव के सैकड़ों लोग, जो बरसों से उस आदमी के पड़ोसी थे, उसके घर पर हमला कर देते हैं और उसे मार देते हैं. वे यह जानने की कोशिश भी नहीं करते कि वह मांस किस जानवर का है.

एक आदमी अपनी संतान की हत्या कर देता है क्योंकि उसे लगता है कि यह एक मजहबी कर्तव्य है. उसे अपने किए पर कोई अफसोस नहीं है.

उत्तराखंड में एक सरकारी स्कूल में छह से दस साल उम्र के बच्चे मिड डे मील का खाना नहीं खाते हैं क्योंकि वह खाना एक दलित महिला बनाती है. वहीं, कुछ लोग एक दूल्हे को घोड़ी पर नहीं चढ़ने देते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि घोड़ी पर चढ़ने का हक समाज में खास जाति के लोगों को ही है.

हर दिन घटने वाली ऐसी और भी तरह की घटनाओं को जो लोग अंजाम दे रहे हैं, वे असामान्य हरकत करते नजर आ सकते हैं, लेकिन इन हरकतों के अलावा उनका बाकी जीवन सामान्य है. ये पागल लोग नहीं हैं. वे नौकरीपेशा या बिजनेसमैन या किसान हो सकते हैं. वे किसी खास मौके पर हत्या कर सकते हैं, अन्यथा वे अपनी पत्नी और बच्चे को प्यार करने वाले सामान्य लोग हो सकते हैं.

ऐसे सामान्य लोगों की असामान्य नजर आने वाली हरकतों को कैसे समझा जाए?

एक आदमी यह क्यों सोचता है कि उसका धर्म खतरे में है और धर्म को बचाने के लिए हत्या करना न सिर्फ उचित है, बल्कि पुण्य का काम है. लोगों की भीड़ यह क्यों सोचती है कि कोई पशु पवित्र है और उसे एक खास धर्म के लोग मार सकते हैं और ऐसा करने वाले को मार डालना उचित होगा?

अपने संतान की हत्या करके किसी परालौकिक शक्ति को खुश करने की ट्रेनिंग एक बाप को कहां से मिलती है? एक बच्चा यह बात कहां से सीखता है कि समाज में कोई दलित भी होता है, जिसका छुआ हुआ नहीं खाना चाहिए? उसे जातिवाद की ट्रेनिंग छह साल की उम्र में कौन देता है? घोड़ी पर चढ़ने को जाति से जोड़कर देखना हमें कौन सिखाता है.

इसमें ज्यादातर चीजें हम बचपन में सीख चुके होते हैं.

दरअसल हमें जो बनना होता है, उसका ज्यादातर हिस्सा बचपन में तब बन चुका होता है, जबकि हमें पता भी नहीं होता है कि हम कुछ बन रहे हैं. विचारों और विचारधाराओं का एक बड़ा हिस्सा हमारे जीवन में तभी आ चुका होता है, जब हम चलना और बोलना सीख रहे होते हैं.

दिमाग में जम चुकी ये चीजें आम तौर पर जीवन भर हमारे साथ चलती हैं और बहुत कम मामलों में ही उनसे मुक्ति मिलती है. हमें लगता ही नहीं है कि उन बातों में कुछ भी असामान्य या गलत है, इसलिए हम ऐसी किसी सोच से मुक्त होने की नहीं.

समाजशास्त्री इसे प्राथमिक सामाजीकरण या प्राइमरी सोशलाइजेशन कहते हैं. सामाजीकरण वह चीज है जिसके जरिए हम समाज के सदस्य के तौर पर जीना सीखते हैं और हमें पता भी नहीं होता कि हम कोई सीखी हुई चीज कर रहे हैं. यह एक ऑटोमैटिक यानी स्वाभाविक प्रक्रिया है.

जैसे कि हमें अगर बचपन में सिखाया गया कि किसी बुजुर्ग के सामने आने पर उसे प्रणाम करना है तो हम बड़े होकर बुजुर्गों को प्रणाम करने लगते हैं. अगर हमें सिखाया गया है कि मुंह खोलकर नहीं खाना चाहिए तो हम मुंह खोलकर नहीं खाएंगे. अगर हमें ट्रेनिंग मिली है कि जूते पहनकर बिस्तर पर नहीं चढ़ना चाहिए तो हम जूते पहनकर बिस्तर पर नहीं चढ़ेंगे. समाज में रहने के नियम, मान्यताओं और शिष्टाचार हम ऐसे ही सीखते हैं.

जो बात आदतों या व्यवहार के बारे में सच है, वही विचारधारा या राजनीतिक चिंतन पर भी लागू होता है. इनकी ट्रेनिंग भी ऐसे ही मिलती है.

मिसाल के तौर पर, दादी-नानी की कहानियों में और स्कूल में गाय पर निबंध लिखते समय अगर हमें सिखाया गया है कि गाय एक पवित्र पशु है और अगर हमें मोहल्ले के अंकल ने या परिवार के लोगों ने बचपन में सिखाया है कि एक खास धर्म के लोग गाय को मारते हैं तो ऐसी बचपन की ट्रेनिंग पाए लोगों के लिए दादरी के गांव में एक आदमी के फ्रिज में खास तरह के मांस होने की बात सुनकर उसे मारने दौड़ पड़ना स्वाभाविक है.

अगर कर्नाटक में हिंदुओं के एक तबके के बच्चों को बचपन से सिखाया गया है कि उनका धर्म महान है और इस पर लगातार बाहर और अंदर से हमले हो रहे हैं और अपने धर्म की रक्षा के लिए किसी को मारना पड़े या मर जाना पड़े तो यह पुण्य का काम है, तो ऐसा बच्चा जब बड़ा होगा तो आसानी से एक लिंगायत महिला की हत्या कर देगा क्योंकि उसे बताया गया है कि लिंगायत लोग अलग धर्म की मांग करके हिंदू धर्म को कमजोर करना चाहते हैं.

अगर किसी आदमी को बचपन से सिखाया गया है कि अल्लाह को कुर्बानी पसंद है, वह कुर्बानी सबसे प्रिय चीज की होनी चाहिए, और सबसे प्रिय चीज अपनी संतान है, तो वह आदमी अपनी संतान को कुर्बान कर सकता है. क्योंकि उसे मालूम ही नहीं है कि वह कोई गलत काम कर रहा है या कि कुर्बानी का कोई और मतलब भी हो सकता है.

इसी तरह एक बच्चे को अगर बचपन से सिखाया जाए कि कुछ लोग जन्म से ऊंच होते हैं और कुछ नीच और जो नीच होते हैं, उनके हाथ का बनाया हुआ खाना नहीं चाहिए, वरना धर्म भ्रष्ट हो जाता है, तो वह बच्चा दलित कुक का बनाया हुआ मिड डे मील नहीं खाएगा. ऐसा करना सिर्फ उसकी गलती नहीं है, यह उसके बचपन की ट्रेनिंग है. उसका प्राइमरी सोशलाइजेशन है.

क्या हम अपने प्राइमरी सोशलाइजेशन यानी बचपन की ट्रेनिंग को लोकतांत्रिक और मानवीय बना सकते हैं? क्योंकि ऐसा किए बगैर बेहतर इंसान और बेहतर नागरिक बन पाना और बना पाना मुमकिन नहीं है.

due to social upbringing in prejudiced environment , children embrace caste and religious discrimination and haterdness , brahmanical socialization teach haterdness , Brahmanical culture is root cause of social problem