भारत के लाल ,५०० महार : सागर
| 03 Jan 2018

वो चल रहे ,तेजी तेजी से बढ़ रहे थे कदम
वो नंगे पाँव थे ,
वो नंगे बदन थे
सर्दियो की हवा से शरीर में रोये , किसी फोड़े की तरह उबर आते
वो तेजी से कदम बढ़ाते जा रहे
कभी काँटा चुभता
तो कभी पत्थर
लेकिन कदम थे रुक नहीं रहे थे
शरीर पर एक अंगोछा
सालो सही ढंग से भोजन ने मिलने से पेट अंदर घुसा हुआ था
वो अब भी भूखे थे , वो प्यासे थे
लेकिन कदम बढ़ते जा रहे थे
वो तेजी से कदम बढ़ा रहे थे
उनके चेहरे की खाल सुखी थी , सुकडी थी काली थी
लेकिन उनके चेहरे और आँखों में एक ख़ुशी थी
उनकी आँखों में एक उत्साह था
क्योकि वो जा रहे थे लड़ने
वो लड़ने जा रहे थे ,अपनी आजादी के लिए
वो जा रहे थे लड़ने उनके खिलाफ जिन्होंने उनके गले में हांडी पीठ पर झाडू बाँधी थी
चलते चलते वो सपने देख रहे अपनी आजादी के ,
वो देख रहे थे अपने मुन्ने को बिना हांडी वाले गले के
वो देख रहे थे मुनिया आंगन में खेलेगी बिना किसी डर के
वो देख रहे थे मुन्ना जा पाएगा स्कूल
सपना पूरा करना था ये ,कदम बढ़ रहे थे लगातार बारम्बार
वो लड़ने जा रहे थे आजादी के लिए
वो अपने आपको देख रहे थे आजाद , न किसी की गुलामी न डर
वो अपने आपको देख रहे थे एक इंसान
ये लड़ाई जरूरी थी
इंसानियत के लिए ,मानवता के लिए
ये लड़ाई जरूरी थे , आने वाले कल के लिए
ये लड़ाई थी , उन गद्दार लोगो के खिलाफ
जो पले थे भारत के टुकडो पर
जो मांगने आये थे हमसे शरण
जो हमसे मांग रहे थे दाना पानी
लेकिन धोखे से बन बैठे मालिक
कहने लगे अपने को ब्रह्मा की सन्तान
गुलाम हो तुम कहने लगे ऐसा है इश्वर का विधान
ये गद्दार , ये जालिम ,ये बर्बर जाति के लोग मालिक बन बैठे
आज इनका खात्मा करना है ,
इसलिए वो लड़ने जा रहे थे , वो इंसानियत का मानवता का सपना पूरा करने जा रहे
वो भारत के लाल जो कहाए ५०० महार
वो जा रहे थे धरती को आजाद कराने
वो जा रहे थे भारत के लाल
वो भारत के लाल ,